शनिवार, 26 नवंबर 2016

श्रीहरि भगवान विष्णु नारायण

हिन्दू धर्म के अनुसार विष्णु 'परमेश्वर' के तीन मुख्य रूपों में से एक रूप हैं। भगवान विष्णु सृष्टि के पालनहार हैं। संपूर्ण विश्व श्रीविष्णु की शक्ति से ही संचालित है। वे निर्गुण, निराकार तथा सगुण साकार सभी रूपों में व्याप्त हैं।

*ईश्वर के ताप के बाद जब जल की उत्पत्ति हुई तो सर्वप्रथम भगवान विष्णु का सगुण रूप प्रकट हुआ। विष्णु की सहचारिणी लक्ष्मी है। विष्णु की नाभी से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। आदित्य वर्ग के देवताओं में विष्णु श्रेष्ठ हैं। और भी कई विष्णु हैं।

*विष्णु का अर्थ- विष्णु के दो अर्थ है- पहला विश्व का अणु और दूसरा जो विश्व के कण-कण में व्याप्त है।

*विष्णु की लीला : भगवान विष्णु के वैसे तो 24 अवतार है किंतु मुख्यत: 10 अवतार को मान्यता है। विष्णु ने मधु केटभ का वध किया था। सागर मंथन के दौरान उन्होंने ही मोहिनी का रूप धरा था। विष्णु द्वारा असुरेन्द्र जालन्धर की स्त्री वृन्दा का सतीत्व अपहरण किया गया था।

*विष्णु का स्वरूप : क्षीर सागर में शेषनाग पर विराजमान भगवान विष्णु अपने चार हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए होते हैं। उनके शंख को 'पाञ्चजन्य' कहा जाता है। चक्र को 'सुदर्शन', गदा को 'कौमोदकी' और मणि को 'कौस्तुभ' कहते हैं। किरीट, कुण्डलों से विभूषित, वनमाला तथा कौस्तुभमणि को धारण करने वाले, कमल नेत्र वाले भगवान श्रीविष्णु देवी लक्ष्मी के साथ निवास करते हैं।

*विष्णु मंत्र : पहला मंत्र- ॐ नमो नारायण। श्री मन नारायण नारायण हरि हरि। दूसरा मंत्र- ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि। ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि।



*विष्णु का निवास : क्षीर सागर में। विष्णु पुराण के अनुसार यह पृथ्वी सात द्वीपों में बंटी हुई है- जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्करद्वीप। ये सातों द्वीप चारों ओर से सात समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं, और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं। दुग्ध का सागर या क्षीर सागर शाकद्वीप को घेरे हुए है। इस सागर को पुष्करद्वीप घेरे हुए है।

भगवान विष्णु के नाम : भगवान श्रीविष्णु ही कहे जाते हैं। वे ही श्रीहरि, गरुड़ध्वज, पीताम्बर, विष्वक्सेन, जनार्दन, उपेन्द्र, इन्द्रावरज, चक्रपाणि, चतुर्भुज, लक्ष्मीकांत, पद्मनाभ, मधुरिपु, त्रिविक्रम,शौरि, श्रीपति, पुरुषोत्तम, विश्वम्भर, कैटभजित, विधु, केशव, शालीग्राम आदि नामों से भी जाना जाता है।

*विष्णु के अवतार : शास्त्रों में विष्णु के 24 अवतार बताए हैं, लेकिन प्रमुख दस अवतार माने जाते हैं- मतस्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बु‍द्ध और कल्कि। 24 अवतारों का क्रम निम्न है-1.आदि परषु, 2.चार सनतकुमार, 3.वराह, 4.नारद, 5.नर-नारायण, 6.कपिल, 7दत्तात्रेय, 8.याज्ञ, 9.ऋषभ, 10.पृथु, 11.मतस्य, 12.कच्छप, 13.धनवंतरी, 14.मोहिनी, 15.नृसिंह, 16.हयग्रीव, 17.वामन, 18.परशुराम, 19.व्यास, 20.राम, 21.बलराम, 22.कृष्ण, 23.बुद्ध और 24.कल्कि।



*वैष्णव संप्रदाय के उप संप्रदाय : वैष्णव के बहुत से उप संप्रदाय है- जैसे बैरागी, दास, रामानंद, वल्लभ, निम्बार्क, माध्व, राधावल्लभ, सखी, गौड़ीय आदि। वैष्णव का मूलरूप आदित्य (वेदों के जन्मदाता चार ईशदूतों में से एक) की आराधना में मिलता है। भगवान विष्णु का वर्णन भी वेदों में मिलता है। पुराणों में विष्णु पुराण प्रमुख से प्रसिद्ध है। विष्णु का निवास समुद्र के भीतर माना गया है।

*वैष्णव ग्रंथ : ऋग्वेद में वैष्णव विचारधारा का उल्लेख मिलता है। ईश्वर संहिता, पाद्मतन्त, विष्णुसंहिता, शतपथ ब्राह्मण, ऐतरेय ब्राह्मण, महाभारत, रामायण, विष्णु पुराण आदि।

*वैष्णव तीर्थ : बद्रीधाम (badrinath), मथुरा (mathura), अयोध्या (ayodhya), तिरुपति बालाजी, श्रीनाथ, द्वारकाधीश।

*वैष्णव संस्कार : 1.वैष्णव मंदिर में विष्णु, राम और कृष्ण की मूर्तियाँ होती हैं। एकेश्‍वरवाद के प्रति कट्टर नहीं है।, 2.इसके संन्यासी सिर मुंडाकर चोटी रखते हैं।, 3.इसके अनुयायी दशाकर्म के दौरान सिर मुंडाते वक्त चोटी रखते हैं।, 4.ये सभी अनुष्ठान दिन में करते हैं।, 5.यह सात्विक मंत्रों को महत्व देते हैं।, 6.जनेऊ धारण कर पितांबरी वस्त्र पहनते हैं और हाथ में कमंडल तथा दंडी रखते हैं।, 7.वैष्णव सूर्य पर आधारित व्रत उपवास करते हैं।, 8.वैष्णवों में दाह संस्कार की रीति हैं। 10.यह चंदन का तीलक खड़ा लगाते हैं।

वैष्णव साधु-संत : वैष्णव साधुओं को आचार्य, संत, स्वामी आदि कहा जाता है।

गुरुवार, 10 नवंबर 2016

मां दुर्गा के कल्याणकारी नाम

या देवी सर्वभुतेषू मातृरूपेण सं‍‍स्थिता।
नमस्तस्यै।। नमस्तस्यै।। नमस्तस्यै नमो नमः।।

हे देवी, भगवती माता, विद्यादायिनी, शक्ति प्रदान करने वाली, लक्ष्मी प्रदान करने वाली को बारंबार नमस्कार है। भगवती चैतन्यरूप से इस संपूर्ण जगत को व्याप्त करके स्थित है, उनको नमस्कार है, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

भगवती से हमेशा अपने कल्याण की प्रार्थना करना चाहिए। अपनी आपत्ति (विपदा, तकलीफ) के नाश की कामना करनी चाहिए। भगवती ने देवताओं पर विपत्ति आने पर उनका कल्याण किया है। उनसे इस प्रकार प्रार्थना करें।

जिस प्रकार पूर्व काल में अपने अभिष्ट की प्राप्ति होने से देवताओं ने जिनकी स्तुति की तथा देवराज इंद्र ने जिनके शरण में जाकर अपनी रक्षा मांगी। कल्याण ईश्वरी माता दुर्गा हमारा कल्याण और मंगल करें तथा सारी आपत्तियों का नाश करें।

देवी से अपने शत्रुओं से बचने के लिए प्रार्थना करें। देवी स्वयं कहती है। मेरे भक्तों को अथवा जो मेरी शरण में आ जाता है, उसकी इच्छा मैं अवश्य पूर्ण करती हूं।
मां दुर्गा

यदि आप शत्रु (आंशिक, मानसिक, शारीरिक) से परेशान है तो निम्न बत्तीस (32) नामों का पाठ करें। आप नि:संदेह विजय प्राप्त करेंगे। नाम इस प्रकार है :-

दुर्गा,
दुर्गातिशमनी,
दुर्गापद्धिनिवारिणी,
दुर्गमच्छेदनी,
दुर्गसाधिनी,
दुर्गनाशिनी,
दुर्गतोद्धारिणी,
दुर्गनिहन्त्री,
दुर्गमापहा,
दुर्गमज्ञानदा,
दुर्गदैत्यलोकदवानला,
दुर्गमा,
दुर्गमालोका,
दुर्गमात्मस्वरूपिणी,
दुर्गमार्गप्रदा,
दुर्गम विद्या,
दुर्गमाश्रिता,
दुर्गमज्ञानसंस्थाना,
दुर्गमध्यानभासिनी,
दुर्गमोहा,
दुर्गमगा,
दुर्गमार्थस्वरूपिणी,
दुर्गमांसुरहंत्रि,
दुर्गमायुधधारिणी,
दुर्गमांगी,
दुर्गमाता,
दुर्गम्या,
दुर्गमेश्वरी,
दुर्गभीमा,
दुर्गभामा,
दुर्गभा,
दुर्गदारिणी।

इस प्रकार इन 32 नामों से मनुष्य अपने जीवन के आंतरिक, बाहर शत्रुओं से बचाव कर सकता है। देवी को अनेक रूपों में पूजा गया है। जो जिस रूप में पूजेगा उसके अनुसार फल प्राप्त करेगा।